दो वर्ष !

कोटा के शुरुआती दौर की उलझन।।

बंद कपाट 
सूखा ललाट 
अक्खड़पन सब उखड़ गया 
पंछी पिंजरे मे पड़ गया ।।

पूर्ण परिवर्तन की चाह 
बङी कठिन यह राह
नीर नयन में 
सपना जना और मर गया 
पंछी पिंजरे में पड़ गया  ।।

नियति की चोट 
नियत में खोट 
वर्षों से सींचा जो बाग
क्षण मे उजङ गया
पंछी पिंजरे मे पड़ गया ।।

और दो साल बाद –

पिंजरे का खुला द्वार 
यशोगान कीर्ति अपार 
पंछी लगा नए पर गया 
उडान ऊँची भर गया ।

क्षितिज अभी दूर 
राह के  रोड़े मंजूर 
परिंदा वादे यही  कर गया 
उडान ऊँची भर गया ।

नियति का खेल 
परिश्रम से मेल
क़फ़स में कल संवर गया 
पंछी उड़ान ऊँची भर गया ।

पुनश्च: आप सभी मित्रों के प्रति आभार व्यक्त करता हूँ की महज दस दिनों की अवधि में ही आपने मुझे 100 फौलोवर्स की संख्या को छूने का अवसर दिया😁। उम्मीद है कि आपका यह प्रेम बरकरार रहेगा।😄 बहुत धन्यवाद ☺☺

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