इतनी भीड़ क्यों है! itni bheed kyon hai? 

जन मन को जकड़ती जंजीर क्यों है
तुम्हारे मुहल्ले में इतनी भीड़ क्यों है?

बुन लिए हैं जाल सड़कों के शहर ने
पुल के नीचे अब भी किसीका नीड़ क्यों है?
बैठे हैं पुरोधा उस पार ,’आजादी’ के
इस पार बेड़ियों में बंधी तकदीर क्यों है?

भेद तो नहीं करती कूँची कलाकार की
फिर चित्रपट पर अधूरी तस्वीर क्यों है?

तीर तक तो आती ही रहती है दूब लहर चढ़कर
यह आत्माभिमान सत्ता की तासीर क्यों है?
लगाया था जोर बराबर का, हमने भी तुमने भी
फिर राष्ट्रवाद तुम्हारे बाप की जागीर क्यों है?

समाजवाद की टेढ़ी नाक!

समाजवाद की टेढ़ी नाक!

एक वक्त था लहराता

समाजवाद का झंडा 

लोहिया जी गुजर गए 

बच गया खाली डंडा 
डंडा टूटा,इतना टूटा 

थोक में रह गई  गिल्ली,

अलख नई जगानी थी

मिली फुस्स माचिस की तिल्ली 
फिर भी सोचा सोशलिस्ट होगी 

निकली काली कपटी बिल्ली 

जो मिला सब कुछ लूटा 

खैर करो, बची रह गई दिल्ली 
राजकुटुंब सवार है

बग्घीवान! तेज  हाँक 

उसूल का दौर गया 

विचारधारे! धूल फांक 
जिन्हे जन गए जननायक 

आज उनके बंगले झाँक 

बची हुई है केवल 

समाजवाद की टेढ़ी नाक!

                                                – वैभव